Saturday, March 27, 2010

नावाकिफ है तू मेरी हैसियत से ,
अनजान है तू की मेरी बिसात क्या है?

तू क्या जानेगा मुझे ऐ बेखबर
तू आदमी है तेरी औकात क्या है?

तुने कब माना औरत को औरत,
वो तो सिर्फ तेरे बिस्तर की शोभा है।

काश तू जानता उसके अंदर की माँ
पर तू बेटा है तेरी जात क्या है?

5 comments:

  1. हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    ReplyDelete
  2. बहुत शानदार लिखा आपने जैसे सामने ही सब कुछ हो रहा हो.....

    ReplyDelete
  3. aap sabhi ka bhuat bhuat dhanywaad.

    ReplyDelete